सिक्किम : पृथ्वी का नया घर

02-May-2016 ||    ||   

सिक्किम : पृथ्वी का नया घर तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुझे बनाया। सिक्किम में पहुंचकर आप कुछ ऐसा ही महसूस करेंगे। बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियों, फूलों के गुच्छों से लदे मैदान, चमकदार रंग-बिरंगी संस्कृति और मनोरंजक त्योहार के साथ यहां की वनस्पति और जीव जंतु यात्रियों के छुट्टिïयों को सुंदर और चुनौतिपूर्ण बनाते हैं। सिक्किम की शान है कंचनजंगा पर्वत जो दुनिया में तीसरा सबसे ऊंचा पर्वत है। बर्फ से ढके पर्वत दुनिया की अविवादित सर्वोच्च श्रृंखला कहे जाते हैं। सिक्किम अपनी हरी भरी वनस्पति, सुंदर प्राकृतिक घाटियों और विशाल पर्वतों के लिए प्रसिद्ध है। यहां समृद्ध और भव्य सांस्कृतिक विरासत के बीच शांति प्रिय लोक रहते हैं जो पर्यटकों का एक अत्यंत सुरक्षित मनोरंजन स्थल प्रदान करते हैं। आज यात्री सिक्किम की यात्रा पर आकर यहां की विहंगम प्राकृतिक सुंदरता के रहस्य की खोज करते हैं। यहां के हरे भरे और घने वन तरह तरह के विशिष्ट फूलों से भरपूर हैं और यहां की पर्वतीय विस्तार सिक्किम की दो मुख्य नदियों के बीच हैं। तिस्ता और रंगीत के सुंदर गांव और पानी के झरने तथा गर्म जल प्रपात लोगों को आकर्षित करते हैं। इन पहाड़ों के बीच अनेक गुफाएं हैं जिन्हें लोग पवित्र मानते हैं और इन्हें धार्मिक स्थल का दर्जा दिया जाता है। प्राकृतिक सुंदरता से सराबोर सिक्किम के हर हिस्से की अपनी खासियत है। घनी हरियाली के बीच उभरे एक नगीने की तरह सिक्किम की राजधानी गंगटोक की अपनी शोभा निराली है। ज्यो ज्यो सड़कें चढ़तीं जाती है नए-नए दृश्य आँखों को लुभाते जाते है। भोर की पहली किरण चाँदी सी चमकती कंचनजंघा के दर्शन यहां से भी किए जा सकते है। यहां की स्थापत्य कला, हरी-भरी घाटियां, आनंद और उल्लास भर कर सैलानियों को रोमांचित करतीं है। विश्व की सबसे ऊंची चोटियों मे तीसरी सबसे ऊंची चोटी कंचनजंघा की तलहटी में बसे गंगटोक का अर्थ, है 'ऊंचा पहाड़Ó। जीरो पॉइंट की ऊंचाई 6000 फुट है पर्वतारोहण के शौकीन कंचनजंघा पहुँचते है। यहाँ तिब्बतोंताजी ऐसा स्थान है, जहां तिब्बत की कला के बेहतरीन नमूनों का उद्यान भी दर्शनीय है। यहां की झीलें भी पर्यटकों को नीली गहराई में डुबकी लगाने को मजबूर करते हैं। खेचीपेरी ताल या यक्ष ताल व छंगु झील ऐसे ही दर्शनीय स्थल है कहा जाता है की यहीं महाभारत में वर्णित यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न पूछे थे। वैसे गंगटोक क ा शाब्दिक अर्थ है, पहाड़ क ी चोटी। वाकई, वहां क ी सड़क ों से गुजरते हुए आपक ो इस सच क ा अनुभव भी होगा। क ंचनजंगा पहाडिय़ों से घिरे इस शहर में जगह-जगह फै ले बौद्ध मठ एक खास धर्म के प्रति आस्था पैदा क रते हैं। सिक्कि म क ी खूबसूरती के बारे में क हा जाता है कि इसे 5-6 दिनों में समेटना असंभव है। शायद टूरिस्ट क ी आसानी के लिए ही टूरिजम डिपार्टमेंट ने सिक्कि म क ो 4 हिस्सों में बांटा है- नॉर्थ, ईस्ट, वेस्ट और साउथ सिक्किम। इनमें सबसे ज्यादा आक र्षक ईस्ट सिक्कि म क ो माना जाता है और गंगटोक भी इसी क ा हिस्सा है। सिक्किम में अब आधुनिक फैशन पहुँच चुका है, विशेषकर गंगटोक शहर किसी महानगर की आधुनिक संस्कृति की पूरी पूरी तस्वीर पेश करता है एक से एक ऊंचे इमारतेए बड़ी-बड़ी दुकाने, सरसराती रंगबिरंगी कारें, वीडियो पार्लर, सड़कों पर चहलकदमी करते लड़के-लड़कियां, मुख्य बाजार में जगह जगह फिल्मी गीतों के कैसेट वगैरह गंगटोक के कुछ नीचे लाल बाज़ार में प्रतिदिन शाम को हाट लगता है, जहां दुकानदारी ज़्यादातर महिलाए ही करती है। सिक्किम का पहनावा अलग अलग तरह का है नेपाली स्त्रियाँ कमर से ऊपर ब्लाउज पहनती है और सिर को एक प्रकार के दुपट्टे से ढकती है। अधिकतर पुरुष चुस्त मिरजाईनुमा ऊंचा कुरता पहनते है। वे कमर मे कपड़ा बांधे रहते है। भोटिया स्त्री पुरुष लंबा चोंगा पहनते है। यहाँ की सभी जातियों की स्त्रियाँ सोना, फिरोजी, पत्तर और तरह तरह के मोती की लडिय़ों के आभूषण पहनती है। फूलों से भरे डीयर पार्क के दुर्लभ हिरणों के प्रजातियाँ देखी जा सकती है। लाल पांडा और चौकड़ी भरते हिरण प्रकृति प्रेमी पर्यटकों को अत्यंत लुभावने लगते है। इस उद्यान मे बुद्ध की स्वर्णजडि़त प्रतिमा लगी हुई है, जो शांति प्रदान करने वाली प्रतीत होती है उद्यान प्रात: 8 बजे से 11 बजे तक तथा छुट्टी के दिन प्रात: 8 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। विभिन्न प्रजातियों के 200 से अधिक दुर्लभ पौधो का संग्रह है। यह तिब्बती संस्थान के नीचे बना एक अनूठा तथा दर्शनीय स्थल है। तिब्बत रिसर्च इंस्टीट्यूट नामक स्थान तिब्बती बौद्ध साहित्य के लिए सारे विश्व में प्रसिद्ध है, इसमे प्राचीन पाण्डुलिपि चित्रकृतियों, पूजा के अनुपम वस्तुओ और प्रतिमाओं आदि का अनूठा संग्रह है, यह देश विदेश के शोधार्थयों के लिए भी कार्य करता है। रोमांचकारियों को आमंत्रण देता सिक्किम : रोमांच के शौकीन लोगों के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। तीस्ता का प्रवाह मानो एक आमंत्रण सा देता है। नदी की तेज धार में उफनते पानी के बीच लाइफ जैकट पहनकर छोटी सी डोंगी को खेने का अनुभव बिना महसूस किए समझा नहीं जा सकता। तीस्ता व रांगितए दोनों ही नदियां राफ्टिंग के लिए उपयुक्त हैं। तीस्ता में शुरुआत माखा से की जा सकती है और यहां से नदी की धार में आप सिरवानी व मामरिंग होते हुए रांगपो तक जा सकते हैं। वहीं रागिंत नदी में सिकिप से शुरुआत करके जोरथांग व माजितार के रास्ते मेल्लि तक जाया जा सकता है। ज्यादा दिलेर व अनुभवी लोगों के लिए कयाकिंग का विकल्प भी है। राफ्टिंग व कयाकिंग के लिए अक्टूबर से दिसंबर तक का समय सबसे ज्यादा मुफीद है जब नदियां अपने पूरे यौवन पर होती हैं। सिक्किम में रोमांच राफ्टिंग के अलावा ट्रैकिंग का भी है। दरअसल राज्य तेजी से ट्रैकिंग का नया बेस बनता जा रहा है। मन व शरीर साथ दे तो ट्रैकिंग के जरिये शायद आप धरती के इस खूबसूरत हिस्से को ज्यादा नजदीकी से देख-समझ सकेंगे। कभी स्तूपों व मठों से गुजरते हुए तो कभी प्रकृति की अद्भुत छटा को निहारते हुएए कभी अचानक ही मिल गए हिरण के पीछे भागते हुए तो कभी किसी ग्रामीण से कंचनजंघा के बारे में दंतकथाएं सुनते हुए आप खुद को एक अलग ही रहस्यमय दुनिया में महसूस करेंगे। यूं तो ट्रैकिंग का असली मजा ही खुद रास्ते खोजने व बनाने का है लेकिन फिर भी सुहूलियत के लिए यहां कई स्थापित ट्रैक है। मार्च से मई और फिर अक्टूबर से दिसंबर के बीच पेमायांग्शे से रालंग तक मोनेस्टिक ट्रैक होता है। इसी तरह मार्च.मई में नया बाजार से पेमायांग्शे तक रोडोडेंड्रोन ट्रैक होता है। कंचनजंघा ट्रैक मध्य मार्च से मध्य जून तक और फिर अक्टूबर से दिसंबर तक युकसोम से शुरू होता है और राठोंग ग्लेशियर तक जाता है। इसे दुनियाभर में सर्वाधिक ऊंचाई वाली झीलों में से एक माना जाता है। यह लेक चारों तरफ से बर्फीले पहाड़ों की बुलंद ऊंचाइयों से घिरी हुई है। पूरे साल इसका पानी दूधिया सफेद रहता है और हिंदुओं व बौद्ध धर्म के लोगों की इसमें गहरी आस्था है। इस झील की पवित्रता के संबंध में कहा जाता है कि कभी यह झील साल भर जमी रहती थी और यहां लोगों को पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं हो पाता था। जब सन् 1516 में गुरु नानक देव तिब्बत से वापस आते समय इस जगह से गुजरे, तो यहां चरवाहों ने उनसे इस मामले में विनती की। इस पर गुरु जी ने जमी हुई झील का एक हिस्सा छुआ, तो उस जगह पानी निकल आया। कहा जाता है कि आज भी इस हिस्से का पानी जमता नहीं है। इस घटना के बाद से इस जगह का नाम गुरुदौंगमर रखा गया और तभी से इसे पवित्र स्थान का दर्जा भी मिला। गुरुदौंगमर लेक के पास ही कुछ समय पहले एक गुरुद्वारे का निर्माण करवाया गया है। 1990 में बनी इस जगह को 'सर्व धर्म स्थलÓ का नाम मिला है। बेशक इस तरह यह तमाम धर्मों के अनुयायियों के लिए खास जगह है। यहाँ की झीलें, झरने और नदियाँ भी बहुत प्रसिद्ध हैं। इनमें से एक टोम्गो झील है। इसका अर्थ सिक्किमी भाषा का शब्द है और नेपाली में इसे छंगू झील कहा जाता है। यहाँ एक मंदाकिनी नाम का झरना भी है। राम तेरी गंगा मैली फिल्म की शूटिंग इसी झरने के पास हुई थी इसलिए इसे मंदाकिनी झरने के नाम से प्रसिद्धि मिली हुई है। यहाँ एक झरने का नाम 'सात बहनेÓ है। सात बहने झरने में पानी पहाड़ी से सात चरणों में नीचे रास्ते तक गिरता है, इसलिए इसे सात बहने कहा गया है। इस झरने के बारे में एक कहानी प्रचलित है। किसी राजा की 7 राजकुमारियां थीं। उन्हें प्रकृति से प्रेम था और वे इसी झरने के रूप में हमेशा प्रकृति की हो गयीं, इसलिए इसका नाम 'सात बहनेÓ पड़ा। यहां के झरनों पर बॉलीवुड का असर ज्यादा है। इसी का प्रभाव है कि यहाँ एक झरने का नाम अमिताभ बच्चन झरना है।

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