शिवहर में नक्सलवाद मुद्दा नहीं

21-Oct-2015 ||    शिवहर ||   

शिवहर में नक्सलवाद मुद्दा नहीं सीतामढ़ी से अलग होकर बना शिवहर जिला पूरी तरह नक्सल प्रभावित है। ये राज्य का अकेला जिला है, जहां एक भी डिग्री कॉलेज नहीं है। ये बिहार का एक ऐसा जिला भी है जो अब तक रेलवे से नहीं जुड़ा है। जिले में यही एक समूची सीट है। पूरा का पूरा जिला नक्सली समस्या से त्रस्त है पर नक्सलवाद कहीं कोई मुद्दा नहीं है। कोई भी प्रत्याशी इस मुद्दे पर बात नहीं करता। चुनाव जातीय समीकरणों पर लड़ा जा रहा है।इस क्षेत्र में कोई भी निर्माण बगैर लेवी दिये नहीं होता। नक्सली संगठन इसकी बाकायदा रसीद देते हैं। सभी ईंट भट्ठों से कई बाजारों से। इसके बावजूद मुजफ्फरपुर की सीमा तक बाजार खूब विकसित हुए हैं। 1994 में सीतामढ़ी से अलग होकर बना ये जिला पूरी तरह नक्सल प्रभावित है। ये राजेपुर, रुन्नीसैदपुर, बेलसंड, रीगा, तरियानी और मीनापुर से घिरा है, जो मुजफ्फरपुर, पूर्वी चम्पारण और सीतामढ़ी के नक्सल प्रभावित प्रखंड हैं। विकास ठप जैसा है और शिवहर शहर शुरू होने से पहले तक एक अजब सी वीरानी। ये शिवहर विधानसभा सीट का हिस्सा है। पूरा का पूरा जिला नक्सली समस्या से त्रस्त है पर नक्सलवाद कहीं कोई मुद्दा नहीं है। कोई भी प्रत्याशी इस मुद्दे पर बात नहीं करता। चुनाव जातीय समीकरणों पर लड़ा जा रहा है और मुकाबला त्रिकोणीय है। लवली आनंद (हम), मोहम्मद सर्फुद्दीन (जदयू) और अजीत कुमार झा (सपा) मुकाबले में हैं। ये राज्य का अकेला जिला है, जहां एक भी डिग्री कॉलेज नहीं है। ये बिहार का एक ऐसा जिला भी है जो अब तक रेलवे से नहीं जुड़ा है। 2007 में शिलान्यास के बाद भी सदर अस्पताल का निर्माण अभी अधूरा है। पढ़ाई, इलाज या अन्य किसी काम के लिए राज्य व देश के किसी भी हिस्से में जाने के लिए लोगों को मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी का चक्कर लगाना पड़ता है। और, इसके लिए यहां सरकारी बस सेवा तक नहीं है। चली भी तो एक बार एक डेढ़ साल चलकर और फिर एक महीने चल कर बंद हो गई। सड़क मार्ग अधूरे हैं। शिवहर-मोतिहारी मार्ग पर बागमती के कटाव के कारण तीन किलो मीटर तक निर्माण नहीं हुआ है जबकि 20 साल से पुल भी नहीं बना। एनएच 104 की कहानी भी यही है। जिले को रेल लाइन से जोड़ने के लिए व 2007 में रेलवे लाइन का शिलान्यास रेल मंत्री लालू प्रसाद ने किया था। तब लागत 204 करोड़ थी। आठ साल बाद भी इस परियोजना का कुछ अता पता नहीं हैं। पूरी हो जाती तो शिवहर सीतामढ़ी और मोतिहारी से जुड़ जाता। डिग्री कॉलेज की घोषणा भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2012 में की थी मगर बात उससे आगे नहीं बढ़ी। यहो उद्योग भी नहीं हैं। मुख्य पेशा कृषि है। मगर बागमती भी इसे नहीं बख्शती है। बांध बनने से कुछ राहत जरूर मिली है। बिजली के लिए ग्रिड सीतामढ़ी में है, लिहाजा गड़बड़ी होती रहती है। चुनावों में विकास की चाहे जितनी बात पर यह जिला सबकी पोल खोल रहा है। यहां छह बार विधायक रहे कद्दावर नेता रघुनाथ झा का ये गृह जिला भी है। उन्हीं के प्रयासों से यह 1983 में प्रखंड से अनुमंडल बना और सिर्फ 11 साल बाद 1994 में जिला। विकास का ये सफर तेजी से तय करने वाले शिवहर को इसके बाद एक-एक बुनियादी सुविधा के लिए लम्बा इंतजार करना पड़ा। 1998 में कलेक्ट्रेट शुरू हुआ और 2001 में इसका भवन तैयार हुआ। कचहरी लम्बे इंतजार के बाद 2012 में शुरू हो सका। इसी साल जिले को जेल मिली। सदर अस्पताल अभी भी रेफरल अस्पताल में ही चल रहा है। सीएस ने इसी साल से जिले में बैठना शुरू किया है। बस जिले के विकास की कहानी यहीं खत्म हो जाती है। इसके अलावा अगर कुछ हुआ है तो बाजार का विस्तार। 10 साल तक पहले तक पुरानी चौक के चारो तरफ जहां छोटी-बड़ी सौ-डेढ़ सौ दुकाने ही होती थीं, अब वहां इनकी संख्या 500-600 और बढ़ गई है। शिवहर विधानसभा क्षेत्र में महागठबंधन (जदयू) से सीटिंग विधायक मो. सर्फुद्दीन को फिर से मैदान में उतारा गया है। एनडीए ने यह सीट हम को दी है और पूर्व सांसद लवली आनंद मुकाबले में हैं। इसके अलावा पिछले चुनाव में राजद से लड़े रघुनाथ झा के बेटे अजीत कुमार ने बगावत कर सपा से ताल ठोंक दी है। महागठबंधन के साथ एनडीए को भी बगावत का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा के पूर्व विधायक ठाकुर रत्नाकर राणा निर्दलीय ही मैदान में उतर गए हैं। समस्याओं से भरपूर इस जिले में चुनाव पूरी जातीय गणित पर लड़ा जा रहा है। राजपूत, ब्राह्मण, मुस्लिम और वैश्य समाज का इस जिले में मुख्य रूप से प्रभाव है।

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