मुजफ्फरपुर में आपका स्वागत है

23-Aug-2016 ||    ||   

मुजफ्फरपुर में आपका स्वागत है नई दिल्ली। दुनिया में लीची के लिए प्रसिद्ध मुजफ्फरपुर बिहार प्रान्त के सबसे बड़े शहरों में से एक है। अपने सूती वस्त्र उद्योग तथा आम और लीची जैसे फलों के उम्दा उत्पादन के लिये यह जिला पूरे विश्व में जाना जाता है, खासकर यहाँ की शाही लिच्ची का कोई जोड़ नहीं। यहा तक भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक को यहां से लिच्ची भेजी जाती है। उत्तर में पूर्वी चंपारण और सीतामढ़ी या सीतामढी, दक्षिण में वैशाली और सारण, पूर्व में समस्तीपुर और दरभंगा तथा पश्चिम में गोपालगंज से मुजफ्फरपुर जिला घिरा है। बज्जिका यहाँ की बोली और हिन्दी तथा उर्दू यहाँ की मुख्य भाषाएँ हैं। मुजफ्फरपुर क्षेत्र का उल्लेख रामायण जैसे ग्रंथों में मिलता है परंतु इसका लिखित इतिहास वैशाली के उद्भव के समय से उपलब्ध है। मिथिला के राजा जनक के समय तिरहुत प्रदेश मिथिला का अंग था। बाद में राजनैतिक शक्ति विदेह से वैशाली की ओर हस्तांतरित हुआ। तीसरी सदी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों से यह पता चलता है कि यह क्षेत्र काफी समय तक महाराजा हर्षवर्धन के शासन में रहा। उनकी मृत्यु के बाद स्थानीय क्षत्रपों का कुछ समय शासन रहा तथा आठवीं सदी के बाद यहाँ बंगाल के पाल वंश के शासकों का शासन शुरु हुआ जो 1019 तक जारी रहा। तिरहुत पर लगभग 11 वीं सदी मे चेदि वंश का भी कुछ समय शासन रहा। सन 1211 से 1226 बीच गैसुद्दीन एवाज तिरहुत का पहला मुसलमान शासक बना। चम्पारण के सिमराँव वंश के शासक हरसिंह देव के समय 1323 ईस्वी में तुग़लक वंश के शासक गयासुद्दीन तुगलक ने इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया लेकिन उसने सत्ता मिथिला के शासक कामेश्वर ठाकुर को सौंप दी। चौदहवीं सदी के अंत में तिरहुत समेत पूरे उत्तरी बिहार का नियंत्रण जौनपुर के राजाओं के हाथ में चला गया जो तबतक जारी रहा जबतक दिल्ली सल्तनत के सिकन्दर लोदी ने जौनपुर के शासकों को हराकर अपना शासन स्थापित नहीं किया। इसके बाद विभिन्न मुगल शासकों और बंगाल के नवाबों के प्रतिनिधि इस क्षेत्र का शासन चलाते रहे। पठान सरदार दाऊद खान को हराने के बाद मुगलों ने नए बिहार प्रांत का गठन किया जिसमें तिरहुत को शामिल कर लिया गया। 1764 में बक्सर की लडाई के बाद यह क्षेत्र सीधे तौर पर अंग्रेजी हुकूमत के अधीन हो गया। सन 1875 में प्रशासनिक सुविधा के लिये तिरहुत का गठन कर मुजफ्फरपुर जिला बनाया गया। मुजफ्फरपुर ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में अत्यंत महत्वपूरण भूमिका निभाई है। महात्मा गाँधी की दो यात्राओं ने इस क्षेत्र के लोगों में स्वाधीनता के चाह की नयी जान फूँकी थी। खुदीराम बोस तथा जुब्बा साहनी जैसे अनेक क्रांतिकारियों की यह कर्मभूमि रही है। 1930 के नमक आन्दोलन से लेकर 1942 के भारत छोडो आन्दोलन के समय तक यहाँ के क्रांतिकारियों के कदम लगातार आगे बढ़ते रहे। मुजफ्फरपुर का वर्तमान नाम ब्रिटिस काल के राजस्व अधिकारी मुजफ्फर खान के नाम पर पड़ा है। 1972 तक मुजफ्फरपुर जिले में शिवहर, सीतामढ़ी तथा वैशाली जिला शामिल था। मुजफ्फरपुर को इस्लामी और हिन्दू सभ्यताओं की मिलन स्थली के रूप में भी देखा जाता रहा है। दोनों सभ्यताओं के रंग यहां गहरे मिले हुये हैं और यही इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान भी है। मुजफ्फरपुर के इस शिव मंदिर को देवघर के समान आदर प्राप्त है। सावन के महीने में यहां शिवलिंग का जलाभिषेक करने वालों भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मुजफ्फरपुर स्थित बाबा गरीबनाथ धाम वर्षों से श्रद्धालुओं के आस्था और श्रद्धा का केन्द्र रहा है। मनोकामना लिंग के रूप में भक्तों के बीच ख्याति पाए बाबा की महिमा की प्रसिद्धि हर साल बढ़ती ही जा रही है। सावन के महीने में विशेषकर सोमवार को सोनपुर के पहलेजा घाट से 70 किलोमीटर की दूरी तय कर कांवडिय़ों का जत्था लाखों की संख्या में पवित्र गंगा जल से बाबा का जलाभिषेक करते हैं। देवघर की तर्ज पर बाबा गरीबनाथ धाम में भी डाक बम गंगा जल लेकर महज 12 घंटे में बाबा का जलाभिषेक करने की परंपरा रही है। भक्तों की बीच बाबा की प्रसिद्धि ऐसी कि हर साल 10 से 15 फीसदी कांवडिय़ों की संख्या बाबा को जलाभिषेक करने के लिए बढ़ते चले जा रहे हैं। ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बाबा गरीबनाथ धाम का तीन सौ साल पुराना इतिहास रहा है। प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, 1812 ई. में इस स्थान पर छोटे मंदिर में बाबा की पूजा-अर्चना होती रही थी। मान्यता है कि सात पीपल का पेड़ यहां के घने जंगल में थे। पेड़ की कटा के समय अचानक खून जैसे लाल पदार्थ निकलने और विशालकाय शिवलिंग के बाद जमीन मालिक को रात में बाबा ने स्वप्न दिया, जिसके बाद विधिवत पूजा-अर्चना की जाने लगी। मान्यता है कि बेहद ही गरीब आदमी के बेटी के विवाह के लिए घर में कुछ भी नहीं था, लेकिन बाबा के दर्शन के बाद सारे सामानों की आपूर्ति अपने-आप हो गई तबसे से लोगों के बीच गरीबनाथ धाम के रूप में बाबा की प्रसिद्धि हुई। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म वैशाली के निकट बसोकुंड में लिच्छवी कुल में हुआ था। यह स्थान जैन धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र है। यहाँ अहिंसा एवं प्राकृत शिक्षा संस्थान भी है। भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान जुब्बा साहनी ने 16 अगस्त 1942 को मीनापुर थाने के इंचार्ज लियो वालर को आग में जिंदा झोंक दिया था। बाद में पकड़े जाने पर उन्हें 11 मार्च 1944 को फांसी दे दी गयी। जिले के इस महान स्वतंत्रता सेनानी की याद में बनाया गया पार्क दर्शनीय है। इसके अलावा अनेक दर्शनीय स्थल यहां मौजूद हैं जिनमें देवी मंदिर,कोठिया मजार (कांटी), शिरूकहीं शरीफ (कांटी),शहीद खुदीराम स्मारक, मजार हजरत दाता कम्मल शाह, मजार हजरत दाता मुजफ्फरशाह, चामुडा स्थान, कटरा प्रमुख हैं।

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