''सच्ची आस्था कभी इतनी नाजुक नहीं होती. यह सतही आस

19-Aug-2016 ||    ||    Mukul kumar

हर कोई पैदा आजाद ही होता है. मगर जल्दी ही दूसरे आपको अपने हिसाब से ढाल लेते हैं. पहले मां-बाप, फिर स्कूल और बाद में समाज. वे आपको बक्से में बंद करने की कोशिश करते हैं, निश्चित तरीकों से चीजों को देखने और तय करने के लिए मजबूर करते हैं. इसी के मुताबिक हमारी मनोग्रंथियां, असुरक्षाएं, डर, आकांक्षाएं और सपने बनते हैं. आखिरकार आप इन्हीं सांचों में चीजों को कसने लगते हैं, फिर एक दिन अचानक आपको एहसास होता है कि आप अपनी पूरी जिंदगी ऑटो मोड में चलते रहे हैं. यह हमारे मकसद को ही हमेशा के लिए ओझल कर देता है, नई चीजें आजमाने, खोजबीन करने और खुद अपना सच पाने के मकसद को. महज इसलिए कि समाज एक पहले से तयशुदा सचाई आपके हाथों में सौंप देता है. तलाश इस समूची जकडऩ को तोडऩे की जद्दोजहद की है, खुद अपना सच पाने की है. यह न रुकने वाला सफर है, सच को समझने की आजादी हासिल करने का सफर. लोगों के बगैर समाज का कोई वजूद नहीं है. अगर आदमी आगे न बढ़े, अपना विकास न करे, तो समाज भी नहीं कर सकता. पर यहां भी एक अजीब द्वैत काम करता है. समाज को बनाया गया था लोगों की आसानी और सुविधा के लिए, उन्हें सही रास्ता दिखाने के लिए. मगर यह उलटे तरीके से काम करना शुरू कर देता है. यह आपको नियंत्रित करने लगता है. यह दिमाग के खिलने-खुलने को न्यौता नहीं देता. समाज तभी तक जिंदा है जब तक इसमें रहने वाले इनसान सवाल पूछ रहे हैं. और अगर समाज के भीतर सुधारक हैं, तो समाज सवालों को न्यौता देगा. दिक्कत यह है कि सत्ता के भूखे लोग नहीं चाहते कि सवाल पूछे जाएं. सवाल पूछने की जरूरत हर शख्स के भीतर मौजूद है, यह अलग बात है कि कभी-कभी लोगों को लगता है कि इसे दबा लेना आसान है. बाज दफा लोगों को इस फितरत से भी डर महसूस करवाया जाता है. बचपन में मैं बड़ी बेसब्री से नमाज के वक्त का इंतजार किया करता था. मैं खुदा की जानिब खालिस मोहब्बत से, उसके और करीब आने की कोशिश करते हुए नमाज पढ़ता था. हालांकि उस वक्त भी मुझे ताज्जुब होता था कि मैं समझता भी हूं कि मैं क्या कह रहा हूं? यही वजह है कि मैंने कुर्बानी की रस्म पर सवाल उठाया. मैंने केवल इतना कहा कि उस रस्म के पीछे की वजह को जानना चाहिए. इस पर वैसी प्रतिक्रियाएं आईं तो यह मेरी आवाज की ताकत नहीं थी, यह उनकी आस्था को ललकारे जाने का डर था. सच्ची आस्था कभी इतनी नाजुक नहीं होती. यह तो सतही आस्था ही है जो आसानी से डर जाती है. मैं इन मुद्दों पर अपने परिवार से हमेशा बात करता हूं. यह कभी मुद्दा नहीं बनता. मगर मेरे बयानों के बाद मेरे भाई ने मुझे बताया कि हमारे दोस्त पूछ रहे हैं, ''भाईजान ने क्या कह दिया है?'' मैंने उससे कहा कि उन सबसे जरा मेरी बात कराओ और हमने बात की. मैंने पूछा, ''मैंने जो कहा उसमें गलत क्या है?'' उन्होंने मुझसे कहा कि आप जो कह रहे हो, वह सही है लेकिन आपको ऐसा कहना नहीं चाहिए था. तो क्या हम अंधे बने रहना चाहते हैं? इससे हमें हासिल क्या होगा?एक बड़ी खूबसूरत लाइन है जो लाइफ ऑफ पई में मेरा किरदार कहता है. यह लाइन अब मेरी जिंदगी का मंत्र ही बन गई है. वह लाइन है, ''शक बड़े काम की चीज है. यह आस्था को जिंदा रखता है. आखिरकार जब तक आप परखोगे नहीं, तब तक आपको अपनी आस्था की ताकत पता ही नहीं चल सकती.''

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